Atharvaveda / 4 / 28 / 5
ययो॑र्व॒धान्नाप॒पद्य॑ते॒ कश्च॒नान्तर्दे॒वेषू॒त मानु॑षेषु। याव॒स्येशा॑थे द्वि॒पदो॒ यौ चतु॑ष्पद॒स्तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 28 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : mRRigaaro.aatharvaa vaa | Devta : bhavaasharvau rudro vaa | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yayorvadhaannaapapadyate kashchanaantardeveShuuta maanuSheShu. yaavasyeshaathe dvipado yau chatuShpadastau no mu~nchatama.mhasaH . 5.
Component Words : yayoH . vadhaat . na . apa.apadyate . kaH . chana . antaH . deveShu . uta . maanuSheShu . yau . asya . iishaathe iti . dvi.apadaH . yau . chatuH.apadaH . tau . naH . mu~nchatam . a.mhasaH .28.5.
In Hindi:
ऋषि : मृगारोऽअथर्वा वा | देवता : भवाशर्वौ रुद्रो वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : ययो॑: । व॒धात् । न । अ॒प॒ऽपद्य॑ते । क: । च॒न । अ॒न्त: । दे॒वेषु॑ । उ॒त । मानु॑षेषु । यौ । अ॒स्य । ईशा॑थे॒ इति॑ । द्वि॒ऽपद॑: । यौ । चतु॑:ऽपद: । तौ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२८.५॥
पदार्थ : (ययोः) जिन तुम दोनों के (वधात्) हनन सामर्थ्य से (देवेषु) प्रकाशमान सूर्य आदि लोकों (उत) और (मानुषेषु अन्तः) मनुष्यों के बीच (कश्चन) कोई भी (न) नहीं (अपपद्यते) छूटकर जाता है। (यौ) जो तुम दोनों (अस्य) इस (द्विपदः) दो पाये समूह के और (यौ) जो तुम दोनों (चतुष्पदः) चौपाये संसार के (ईशाथे) ईश्वर हो, (तौ) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥५॥"
भावार्थ : सर्वनियन्ता जगदीश्वर की आज्ञा पालन करके सब मनुष्य आनन्द प्राप्त करें ॥५॥
टिप्पणी :५−(ययोः) भवाशर्वयोः (वधात्) अ० १।२०।२। हननसामर्थ्यात् (न) निषेधे (अपपद्यते) अपेत्य गच्छति (कश्चन) कोऽपि (अन्तः) मध्ये (देवेषु) प्रकाशमानेषु सूर्यादिलोकेषु (उत) अपि च (मानुषेषु) अ० ४।१४।५। मनुष-अण्। मनुष्येषु। अन्यत् पूर्ववत् म० १ ॥