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Atharvaveda / 4 / 33 / 2

सु॑क्षेत्रि॒या सु॑गातु॒या व॑सू॒या च॑ यजामहे। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 33 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : सब प्रकार की रक्षा का उपदेश।

पदपाठ : सु॒ऽक्षे॒त्रि॒या । सु॒ऽगा॒तु॒या । व॒सु॒ऽया । च॒ । य॒जा॒म॒हे॒ । अप॑ । न॒: । शोशु॑चत् । अ॒घम् ॥३३.२॥

पदार्थ : (सुक्षेत्रिया) उत्तम खेत के लिये, (सुगातुया) उत्तम भूमि के लिये (च) और (वसुया) धनके लिये (यजामहे) हम [परमेश्वर को] पूजते हैं। (नः) हमारा (अघम्) पाप (अप शोशुचत्) दूर धुल जावे ॥२॥"

भावार्थ : मनुष्य परमेश्वर की महिमा जानकर अनिष्टों को मिटाकर पुरुषार्थ से अपनी प्रभुता बढ़ावें ॥२॥

टिप्पणी :२−(सुक्षेत्रिया) इयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम्। वा० पा० ७।१।३९। इति ङेर्डियाजादेशः। चित्त्वादन्तोदात्तः शोभनाय क्षेत्राय (सुगातुया)। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति ङेर्याच्। गातुः−पृथिवीनाम-निघ० १।१। शोभनभूमिप्राप्तये (वसुया) पूर्वसूत्रेण ङेर्याच्। वसुने धनाय (च) समुच्चये (यजामहे) परमेश्वरं पूजयामः। अन्यत्पूर्ववत् ॥