Atharvaveda / 4 / 34 / 4
वि॑ष्टा॒रिण॑मोद॒नं ये पच॑न्ति॒ नैना॑न्य॒मः परि॑ मुष्णाति॒ रेतः॑। र॒थी ह॑ भू॒त्वा र॑थ॒यान॑ ईयते प॒क्षी ह॑ भू॒त्वाति॒ दिवः॒ समे॑ति ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 34 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : atharvaa | Devta : brahmaudanam | Metre : uttamaa bhuriktriShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : viShTaariNamodana.m ye pachanti nainaanyamaH pari muShNaati retaH. rathii ha bhuutvaa rathayaana iiyate pakShii ha bhuutvaati divaH sameti . 4.
Component Words : viShTaariNam . odanam . ye . pachanti . na . enaan . yamaH . pari . muShNaati . retaH . rathii . ha . bhuutvaa . ratha.ayaane . iiyate . pakShii . ha . bhuutvaa . ati . divaH . sam . eti .34.4.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : ब्रह्मौदनम् | छन्द : उत्तमा भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदपाठ : वि॒ष्टा॒रिण॑म् । ओ॒द॒नम् । ये । पच॑न्ति । न । ए॒ना॒न् । य॒म: । परि॑ । मु॒ष्णा॒ति॒ । रेत॑: । र॒थी । ह॒ । भू॒त्वा । र॒थ॒ऽयाने॑ । ई॒य॒ते॒ । प॒क्षी । ह॒ । भू॒त्वा । अति॑ । दिव॑: । सम् । ए॒ति॒ ॥३४.४॥
पदार्थ : (ये) जो महात्मा (विष्टारिणम्) विस्तारवान् (ओदनम्) सेचनशील वा अन्नरूप परमात्मा को [हृदय में] (पचन्ति) पक्का करते हैं, (एनान्) इन से (यमः) नियम (रेतः) सामर्थ्य को (न) नहीं (परि मुष्णाति) मूस लेता है। वह पुरुष (रथयाने) शरीर से चलने योग्य संसार में (ह) निश्चय करके (रथी) क्रीडाशील (भूत्वा) होकर (ईयते) विचरता है और (ह) अवश्य (पक्षी) सबका पक्ष करनेवाला (भूत्वा) होकर (अति) अत्यन्त (दिवः) प्रकाशमान लोकों को (सम्) यथावत् (एति) पाता है ॥४॥"
भावार्थ : परमात्मा में पूर्ण श्रद्धालु शूरवीर महात्मा सदा बलवान् होकर संसार को सहारा देते हुए सूर्यसमान प्रकाशित रहते और आनन्द भोगते हैं ॥४॥
टिप्पणी :४-पचन्तीत्यन्तं व्याख्यातम् म० ३। (न) निषेधे (एनान्) एतान्। अपादाने द्वितीया (यमः) नियमः (परि) वर्जने (मुष्णाति) द्विकर्मकः। अपहरति (रेतः) बलं सामर्थ्यम् (रथो) रथ-इनि। रथवान् (ह) अवधारणे (भूत्वा) (रथयाने) रथेन शरीरेण यातव्ये लोके (ईयते) ईङ् गतौ। संचरति (पक्षी) पक्ष परिग्रहे-अच्, तत-इनि। पक्षवान् परिग्रही (अति) अत्यन्तम् (दिवः) प्रकाशमानान् लोकान् (समेति) सम्यक् प्राप्नोति ॥