Atharvaveda / 4 / 37 / 7
आ॒नृत्य॑तः शिख॒ण्डिनो॑ गन्ध॒र्वस्या॑प्सराप॒तेः। भि॒नद्मि॑ मु॒ष्कावपि॑ यामि॒ शेपः॑ ॥ 7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 37 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : baadaraayaNiH | Devta : gandharvaapsarasaH | Metre : paroShNik | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aanRRityataH shikhaNDino gandharvasyaapsaraapateH. bhinadmi muShkaavapi yaami shepaH . 7.
Component Words : aa.anRRityataH . shikhaNDinaH . gandharvasya . apsaraa.apateH . bhinadmi . muShkau . api . yaami . shepaH .37.7.
In Hindi:
ऋषि : बादरायणिः | देवता : गन्धर्वाप्सरसः | छन्द : परोष्णिक् | स्वर :
विषय : गन्धर्व और अप्सराओं के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : आ॒ऽनृत्य॑त: । शि॒ख॒ण्डिन॑: । ग॒न्ध॒र्वस्य॑ । अ॒प्स॒रा॒ऽप॒ते: । भि॒नद्मि॑ । मु॒ष्कौ । अपि॑ । या॒मि॒ । शेप॑: ॥३७.७॥
पदार्थ : (आनृत्यतः) सब ओर चेष्टा करनेवाले, (शिखण्डिनः) महा उद्योगी (गन्धर्वस्य) वेदवाणी और पृथिवी आदि को धारण करनेवाले (अप्सरापतेः) आकाश, जल, प्राण और प्रजाओं में व्यापक शक्तियों के रक्षक परमेश्वर का (शेपः) सामर्थ्य (यामि) मैं माँगता हूँ, [जिससे] (मुष्कौ) [कामक्रोधरूप] दो चोरों को (अपि) अवश्य (भिनद्भि) छिन्न-भिन्न करूँ ॥७॥"
भावार्थ : सर्वव्यापक सर्वनियामक परमेश्वर के विचार से मनुष्य जितेन्द्रिय होकर कुकाम कुक्रोध आदि दोषों को मिटावें ॥७॥
टिप्पणी :७−(आनृत्यतः) नृती गात्रविक्षेपे-शतृ। सम्यक् चेष्टायमानस्य (शिखण्डिनः) म० ४। उद्योगिनः (गन्धर्वस्य) म० २। पृथिव्यादिधारकस्य (अप्सरापतेः) अ० २।२।३। अप्सराणाम् आकाशजलप्राणप्रजासु सरणशीलानां शक्तीनां पालकस्य परमेश्वरस्य (भिनद्मि) विदारयामि (मुष्कौ) सृवृमृषिमुषिभ्यः कक्। उ० ३।४१। इति मुष स्तेये-कक्। कामक्रोधरूपौ तस्करौ (अपि) एव (यामि) याच्ञाकर्मा-निघ० ३।१९। अहं याचे (शेपः) पानीविषिभ्यः पः। उ० ३।२३। इति शीङ् शयने-प। शेपो वैतस इति पुंस्प्रजननस्य। शेपः शपतेः स्पृशतिकर्मणः-निरु० ३।२१। सामर्थ्यम् ॥