Atharvaveda / 5 / 4 / 4
हि॑र॒ण्ययी॒ नौर॑चर॒द्धिर॑ण्यबन्धना दि॒वि। तत्रा॒मृत॑स्य॒ पुष्पं॑ दे॒वाः कुष्ठ॑मवन्वत ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : bhRRigva~NgiraaH | Devta : kuShThastakmanaashanaH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : hiraNyayii nauracharaddhiraNyabandhanaa divi. tatraamRRitasya puShpa.m devaaH kuShThamavanvata . 4.
Component Words : hiraNyayii . nauH . acharat . hiraNya.abandhanaa . divi . tatra . amRRitasya . puShpam . devaaH . kuShTham . avanvata .4.4.
In Hindi:
ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : कुष्ठस्तक्मनाशनः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : हि॒र॒ण्ययी॑ । नौ: । अ॒च॒र॒त् । हिर॑ण्यऽबन्धना । दि॒वि । तत्र॑ । अ॒मृत॑स्य । पुष्प॑म् । दे॒वा: । कुष्ठ॑म् । अ॒व॒न्व॒त॒ ॥४.४॥
पदार्थ : (हिरण्ययी) तेजोमयी, (हिरण्यबन्धना) तेजोमय बन्धनवाली (नौः) नाव (दिवि) प्रकाशलोक में (अचरत्) चलती थी। (तत्र) वहाँ पर (अमृतस्य) अमृत के (पुष्पम्) विकाश, (कुष्ठम्) गुणपरीक्षक पुरुष को (देवाः) विद्वान् लोगों ने (अवन्वत) माँगा है ॥४॥"
भावार्थ : विद्वान् लोग तीक्ष्णबुद्धि मनुष्य द्वारा उत्तम विद्या का प्रकाश करके आनन्द पाते हैं ॥४॥
टिप्पणी :४−(हिरण्ययी) हिरण्ययी तेजोमयी (नौः) अ० ३।६।७। तरणिः (अचरत्) अगमत् (हिरण्यबन्धना) तेजोमयबन्धनयुक्ता (दिवि) प्रकाशलोके (पुष्पम्) पुष्प विकसने−पचाद्यच्। विकाशम्। अन्यद् गतम्। म० ३ ॥