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Atharvaveda / 5 / 5 / 3

वृ॒क्षंवृ॑क्ष॒मा रो॑हसि वृष॒ण्यन्ती॑व क॒न्यला॑। जय॑न्ती प्रत्या॒तिष्ठ॑न्ती॒ स्पर॑णी॒ नाम॒ वा अ॑सि ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : लाक्षासूक्तम् | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्म विद्या का उपदेश।

पदपाठ : वृ॒क्षम्ऽवृ॑क्षम् । आ । रो॒ह॒सि॒ । वृ॒ष॒ण्यन्ती॑ऽइव । क॒न्यला॑ । जय॑न्ती । प्र॒ति॒ऽआ॒तिष्ठ॑न्ती । स्पर॑णी । नाम॑ । वै । अ॒सि॒ ॥५.३॥

पदार्थ : (वृक्षंवृक्षम्) प्रत्येक स्वीकारयोग्य पदार्थ में (आ) सब प्रकार (रोहसि) तू प्रकट है, (वृषण्यन्ती इव) जैसे ऐश्वर्यवान् सूर्य को चाहनेवाली (कन्यला) प्रकाश पानेहारी उषा [सूर्य में] है। (जयन्ती) जप करनेहारी (प्रत्यातिष्ठन्ती) प्रत्यक्ष स्थिर रहनेहारी और (स्परणी) प्रीति करनेवाली शक्ति (नाम) नाम (वै) अवश्य (असि) तू है ॥३॥"

भावार्थ : वह सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी प्रत्येक वस्तु में ऐसा प्रीति से रम रहा है, जैसे उषा सूर्य्य में ॥३॥

टिप्पणी :३−(वृक्षंवृक्षम्) वृक्ष स्वीकारे−पचाद्यच्। प्रत्येकं वरणीयं पदार्थम् (आ)। समन्तात् (रोहसि) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च। प्रकटोऽसि (वृषण्यन्ती) वृषन्−अ० १।१२।१। सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। इति क्यच्−शतृ। वृषाणं सूर्यमिच्छन्ती (इव) यथा (कन्यला) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति कनी दीप्तिकान्तिगतिषु−यक्, ला आदाने−क टाप्। प्रकाशाग्निहोत्री। उषाः (जयन्ती) तॄभूवहिवसि०। उ०। ३।१२८। इति जि जये−झच्, ङीष्। विजया (प्रत्यातिष्ठन्ती) ष्ठा−शतृ। प्रत्यक्षेण स्थात्री (स्परणी) स्पृ प्रीतिपालनयोः−ल्युट्, ङीप्। प्रीणयित्री (नाम) (वै) (असि) ॥