Atharvaveda / 5 / 5 / 7
हिर॑ण्यवर्णे॒ सुभ॑गे॒ शुष्मे॒ लोम॑शवक्षणे। अ॒पाम॑सि॒ स्वसा॑ लाक्षे॒ वातो॑ हा॒त्मा ब॑भूव ते ॥ 7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : atharvaa | Devta : laakShaasuuktam | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : hiraNyavarNe subhage shuShme lomashavakShaNe. apaamasi svasaa laakShe vaato haatmaa babhuuva te . 7.
Component Words : hiraNya.avarNe . su.abhage . shuShme . lomasha.avakShaNe . apaam . asi . svasaa . laakShe . vaataH . ha . aatmaa . babhuuva . te .5.7.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : लाक्षासूक्तम् | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदपाठ : हिर॑ण्यऽवर्णे । सुऽभ॑गे । शुष्मे॑ । लोम॑शऽवक्षणे । अ॒पाम् । अ॒सि॒ । स्वसा॑ । ला॒क्षे॒ । वात॑: । ह॒ । आ॒त्मा । ब॒भू॒व॒ । ते॒ ॥५.७॥
पदार्थ : (हिरण्यवर्णे) हे तेजःस्वरूपिणी ! (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (शुष्मे) हे महाबलवाली ! (लोमशवक्षणे) हे छेदनशीलों पर रोषवाली ! (लाक्षे) हे दर्शनीयशक्ति परमात्मन् ! तू (अपाम्) व्यापक प्रजाओं की (स्वसा) अच्छे प्रकार प्रकाश करनेहारी (असि) है। (ते) तेरा (आत्मा) आत्मा (ह) निश्चय करके (वातः) व्यापक (बभूव) हुआ है ॥७॥"
भावार्थ : महाधनी सर्वशक्तिमान् सर्वजनक परमेश्वर दुष्टों पर क्रोध करता है, इस से हम सदा उत्तम कर्म करते रहें ॥७॥ लोक में (लाक्षासूक्तम्) लाख वा लाह को भी कहते हैं ॥
टिप्पणी :७−(हिरण्यवर्णे) हे तेजःस्वरूपे (सुभगे) हे शोभनैश्वर्ययुक्ते (शुष्मे) शुष्मं बलम्−२।९। अर्शआद्यच्। हे बलवति (लोमशवक्षणे) नामन्सीमन्व्योमन्लोमन्०। उ० ४।१५१। इति लूञ् छेदने−मनिन्। लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः। पा० ५।२।१००। इति लोम−श, मत्वर्थे। वक्ष रोषे−ल्युट्। हे लोमशेषु छेदनस्वभावेषु रोषशीले (अपाम्) व्याप्तानां प्रजानाम् (असि) (स्वसा) म० १। सुष्ठु दीपयित्री, (लाक्षे) गुरोश्च हलः। पा० ३।३।१०३। इति लक्ष दर्शनाङ्कनयोरालोचने च−अ, टाप्, पृषोदरादित्वाद्वृद्धिः। हे दर्शनीये शक्ते परमात्मन् (वातः) व्यापकः (ह) निश्चयेन (आत्मा) स्वरूपम् (बभूव) (ते) तव ॥