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Atharvaveda / 5 / 9 / 3

अ॒न्तरि॑क्षाय॒ स्वाहा॑ ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : वास्तोष्पतिः | छन्द : दैवी जगती | स्वर :

विषय : आत्मा की उन्नति का उपदेश —

पदपाठ : अ॒न्तरि॑क्षाय । स्वाहा॑ ॥९.३॥

पदार्थ : (अन्तरिक्षाय) भीतर दिखाई देने हारे हृदय [की शुद्धि] के लिये (स्वाहा) प्रार्थना है ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३−(अन्तरिक्षाय) सर्वमध्ये दृश्यमानाय हृदयाय। तस्य शुद्धये−इत्यर्थः। अन्तरिक्षं कस्माद् अन्तरा क्षान्तं भवत्यन्तरेमे इति वा शरीरेष्वन्तरक्षयमिति वा−निरु० २।१० ॥