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Atharvaveda / 5 / 10 / 2

अ॒श्म॒व॒र्म मे॑ऽसि॒ यो मा॒ दक्षि॑णाया दि॒शोऽघा॒युर॑भि॒दासा॑त्। ए॒तत् स ऋ॑च्छात् ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : वास्तोष्पतिः | छन्द : यवमध्या त्रिपदा गायत्री | स्वर :

विषय : ब्रह्म की उत्तमता का उपदेश।

पदपाठ : अ॒श्म॒ऽव॒र्म । मे॒ । अ॒सि॒ । य: । मा॒ । दक्षि॑णाया: । दि॒श: । अ॒घ॒ऽयु: । अ॒भि॒ऽदासा॑त् । ए॒तत् । स: । ऋ॒च्छा॒त् ॥१०.२॥

पदार्थ : [हे ब्रह्म!] (मे) मेरे लिये तू (अश्मवर्म) पत्थर के घर [के समान दृढ़] (असि) है। (यः) जो (अघायुः) बुरा चीतनेवाला मनुष्य (दक्षिणायाः) दक्षिण वा दाहिनी (दिशः) दिशा से (मा) मुझ पर (अभिदासात्) चढ़ाई करे, (सः) वह दुष्ट (एतत्) व्यापक दुःख (ऋच्छात्) पावे ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(दक्षिणायाः) दक्षिणस्याः। दक्षिणहस्तस्थितायाः ॥