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Atharvaveda / 5 / 19 / 8

तद्वै रा॒ष्ट्रमा स्र॑वति॒ नावं॑ भि॒न्नामि॑वोद॒कम्। ब्र॒ह्माणं॒ यत्र॒ हिंस॑न्ति॒ तद्रा॒ष्ट्रं ह॑न्ति दु॒च्छुना॑ ॥ 8॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 19 | Paryay : | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : मयोभूः | देवता : ब्रह्मगवी | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।

पदपाठ : तत् । वै । रा॒ष्ट्रम् । आ । स्र॒व॒ति॒ । नाव॑म् । भि॒न्नाम्ऽइ॑व । उ॒द॒कम् । ब्र॒ह्माण॑म् । यत्र॑ । हिस॑न्ति । तत् । रा॒ष्ट्रम्। ह॒न्ति॒ । दु॒च्छुना॑ ॥१९.८॥

पदार्थ : (तत्) वह [दुष्ट कर्म] (वै) निश्चय करके (राष्ट्रम्) राज्य को (आ स्रवति) बहा देता है (उदकम् इव) जैसे जल (भिन्नाम्) टूटी (नावम्) नाव को। (यत्र) जहाँ (ब्राह्मणम्) ब्राह्मण को (हिंसन्ति) वे सताते हैं, (दुच्छुना) दुर्गति वा दरिद्रता (तत् राष्ट्रम्) उस राज्य को (हन्ति) मिटा देती है ॥८॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :८−(तत्) दुष्ट कर्म (वै) निश्चयेन (राष्ट्रम्) राज्यम् (आ) समन्तात् (स्रवति) स्रावयति प्लावयति (नावम्) अ० २।३६।५। नोद्यं पोतम् (भिन्नाम्) छिन्नाम् (इव) यथा (उदकम्) जलम् (ब्राह्मणम्) (यत्र) (हिंसन्ति) दुःखयन्ति (तत्) (राष्ट्रम्) राज्यम् (हन्ति) नाशयति (दुच्छुना) अ० १७।४। दुष्टा गतिः दरिद्रता ॥