Atharvaveda / 5 / 27 / 6
त॒री म॒न्द्रासु॑ प्र॒यक्षु॒ वस॑व॒श्चाति॑ष्ठन्वसु॒धात॑रश्च ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 27 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : brahmaa | Devta : iLaa, sarasvatii, bhaaratii | Metre : dvipadaa viraaDgaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : tarii mandraasu prayakShu vasavashchaatiShThanvasudhaatarashcha . 6.
Component Words : tarii . mandraasu . pra.ayakShu . vasavaH . cha . atiShThan . vasu.adhaataraH . cha .27.6.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : इळा, सरस्वती, भारती | छन्द : द्विपदा विराड्गायत्री | स्वर :
विषय : पुरुषार्थ का उपदेश।
पदपाठ : त॒री । म॒न्द्रासु॑ । प्र॒ऽयक्षु॑ । वस॑व: । च॒ । अति॑ष्ठन् । व॒सु॒ऽधात॑र: । च॒ ॥२७.६॥
पदार्थ : (मन्द्रासु) आनन्दक्रियाओं में और (प्रयक्ष) बड़े समाजों में (तरी) तारनेवाला विद्वान् (च) और (वसुधातरः) अधिक धनों का धारण करनेवाला पुरुष (च) और (वसवः) उत्तम-उत्तम गुणी लोग (अतिष्ठन्) स्थित हुए हैं ॥६॥"
भावार्थ : टिप्पणी :६−(तरी) तरस्तरणमस्यास्तीति। तर−इनि। संतारको विद्वान् (मन्द्रासु) स्फायितञ्चिवञ्चि०। उ० २।१३। इति मदि मोदे−रक्, टाप्। हर्षक्रियासु (प्रयक्षु) म० ५। प्रकृष्टसमाजेषु (वसवः) उत्तमगुणाः पुरुषाः (च) (अतिष्ठन्) स्थिता अभवन् (वसुधातरः) वसुधा−तरप्। अधिकधनानां धारकः (च) ॥