Atharvaveda / 6 / 54 / 2
अ॒स्मै क्ष॒त्रम॑ग्नीषोमाव॒स्मै धा॑रयतं र॒यिम्। इ॒मं रा॒ष्ट्रस्या॑भीव॒र्गे कृ॑णु॒तं यु॒ज उत्त॑रम् ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 6 | Sukta : 54 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : brahmaa | Devta : agniiShomau | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : asmai kShatramagniiShomaavasmai dhaarayata.m rayim. ima.m raaShTrasyaabhiivarge kRRiNuta.m yuja uttaram . 2.
Component Words : asmai . kShatram . agniiShomau . asmai . dhaarayatam . rayim . imam . raaShTrasya . abhi.avarge . kRRiNutam . yuje. ut.ataram .54.2.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अग्नीषोमौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राज्य की रक्षा के लिये उपदेश।
पदपाठ : अ॒स्मै । क्ष॒त्रम् । अ॒ग्नी॒षो॒मौ॒ । अ॒स्मै । धा॒र॒य॒त॒म् । र॒यिम् । इ॒मम् । रा॒ष्ट्रस्य॑ । अ॒भि॒ऽव॒र्गे । कृ॒णु॒तम् । यु॒जे। उत्ऽत॑रम् ॥५४.२॥
पदार्थ : (अग्नीषोमौ) हे सूर्य और चन्द्रमा ! तुम दोनों (अस्मै) इस पुरुष के लिये (क्षत्रम्) राज्य को और (अस्मै) इसके लिये (रयिम्) सम्पत्ति को (धारयतम्) दृढ़ करो। (इमम्) इस पुरुष को (राष्ट्रस्य) राज्य के (अभीवर्गे) मण्डल में (युजे) मित्र वर्ग के लिये (उत्तरम्) अधिक ऊँचा (कृणुतम्) करो ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(अस्मै) पुरुषाय (क्षत्रम्) राष्ट्रम् (अग्नीषोमौ) सूर्यचन्द्रौ (अस्मै) (धारयतम्) दृढीकुरुतम् (रयिम्) वैभवम् (इमम्) पुरुषम् (राष्ट्रस्य) राज्यस्य (अभीवर्गे) अ० ३।५।२। राज्यमण्डले (कृणुतम्) कुरुतम् (युजे) मित्रवर्गहिताय (उत्तरम्) उच्चतरम् ॥