Atharvaveda / 6 / 95 / 2
हि॑र॒ण्ययी॒ नौर॑चर॒द्धिर॑ण्यबन्धना दि॒वि। तत्रा॒मृत॑स्य॒ पुष्पं॑ दे॒वाः कुष्ठ॑मवन्वत ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 6 | Sukta : 95 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : bhRRigva~Ngiraa | Devta : vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : hiraNyayii nauracharaddhiraNyabandhanaa divi. tatraamRRitasya puShpa.m devaaH kuShThamavanvata . 2.
Component Words : hiraNyayii . nauH . acharat . hiraNya.abandhanaa . divi . tatra . amRRitasya . puShpam . devaaH . kuShTham . avanvata .95.2.
In Hindi:
ऋषि : भृग्वङ्गिरा | देवता : वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : हि॒र॒ण्ययी॑ । नौ: । अ॒च॒र॒त् । हिर॑ण्यऽबन्धना । दि॒वि । तत्र॑ । अ॒मृत॑स्य । पुष्प॑म् । दे॒वा: । कुष्ठ॑म् । अ॒व॒न्व॒त॒ ॥९५.२॥
पदार्थ : (हिरण्ययी) तेजवाली [अग्नि वा बिजुली वा सूर्य से चलनेवाली] (हिरण्यबन्धना) तेजोमय बन्धनवाली (नौः) नाव (दिवि) चलने के व्यवहार में (अचरत्) चलती थी। (तत्र) वहाँ पर (अमृतस्य) अमृत के (पुष्पम्) विकाश, (कुष्ठम्) गुणपरीक्षक पुरुष को (देवाः) विद्वान् लोगों ने (अवन्वत) माँगा है ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(हिरण्ययी) तेजोमयी अग्निना विद्युता सूर्येण वा गन्त्री (दिवि) गमने ॥ अन्यद्यथा−अ० ५।४।४ ॥