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Atharvaveda / 6 / 138 / 5

यथा॑ न॒डं क॒शिपु॑ने॒ स्त्रियो॑ भि॒न्दन्त्यश्म॑ना। ए॒वा भि॑नद्मि ते॒ शेपो॒ऽमुष्या॒ अधि॑ मु॒ष्कयोः॑ ॥5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 6 | Sukta : 138 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : नितत्नीवनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : निर्बलता हटाने का उपदेश।

पदपाठ : यथा॑ । न॒डम् । क॒शिपु॑ने । स्रिय॑: । भि॒न्दन्ति॑ । अश्म॑ना । ए॒व । भि॒न॒द्मि॒ । ते॒ । शेप॑: । अ॒मुष्या॑: । अधि॑ । मु॒ष्कयो॑: ॥१३८.५॥

पदार्थ : (यथा) जैसे (स्त्रियः) स्त्रियाँ (नडम्) नरकट घास आदि को (कशिपुने) अन्न वा वस्त्र के लिये (अश्मना) पत्थर से (भिन्दन्ति) तोड़ती हैं। (एव) वैसे ही (ते) तेरे लिये (अमुष्याः) उस [नीरोग नाडी] से अलग (मुष्कयोः) दोनों अण्डकोशों के (शेपः) रोग बल को (अधि) अधिकार के साथ (भिनद्मि) मैं तोड़ता हूँ ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५−(यथा) येन प्रकारेण (नडम्) तृणम् (कशिपुने) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। इति कश गतिशासनयोः−कु, निपातनात् साधुः। अन्नाय वस्त्राय वा−अमर० २३।१३०। (स्त्रियः) (भिन्दन्ति) आघ्नन्ति (अश्मना) पाषाणेन (एव) एवम् (भिनद्मि) (ते) तुभ्यम् (शेपः) रोगबलम् (अमुष्याः) तस्या नीरोगाया नाड्याः (अधि) अधिकृत्य (मुष्कयोः) अण्डकोशयोः ॥