Atharvaveda / 8 / 5 / 13
नैनं॑ घ्नन्त्यप्स॒रसो॒ न ग॑न्ध॒र्वा न मर्त्याः॑। सर्वा॒ दिशो॒ वि रा॑जति॒ यो बिभ॑र्ती॒मं म॒णिम् ॥ 13॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 8 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 13
In English:
Seer : shukraH | Devta : kRRityaaduuShaNam athavaa mantroktaaH | Metre : chatuShpadaa bhurigjagatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : naina.m ghnantyapsaraso na gandharvaa na martyaaH. sarvaa disho vi raajati yo bibhartiima.m maNim . 13.
Component Words : na . enam . ghnanti . apsarasaH . na . gandharvaaH . na . martyaaH . sarvaaH . dishaH . vi . raajati . yaH . bibharti . imam . maNim .5.13.
In Hindi:
ऋषि : शुक्रः | देवता : कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः | छन्द : चतुष्पदा भुरिग्जगती | स्वर :
विषय : हिंसा के नाश का उपदेश।
पदपाठ : न । ए॒न॒म् । घ्न॒न्ति॒ । अ॒प्स॒रस॑: । न । ग॒न्ध॒र्वा: । न । मर्त्या॑: । सर्वा॑: । दिश॑: । वि । रा॒ज॒ति॒ । य: । बिभ॑र्ति । इ॒मम् । म॒णिम् ॥५.१३॥
पदार्थ : (एनम्) उस पुरुष को (न) न तो (अप्सरसः) अप्सराएँ [आकाश में चलनेवाली बिजुलियाँ], (न) न (गन्धर्वाः) गन्धर्व [पृथिवी धारण करनेवाले मेघ] और (न) न (मर्त्याः) मनुष्य (घ्नन्ति) मारते हैं। वह (सर्वाः) सब (दिशः) दिशाओं पर (वि राजति) शासन करता है, (यः) जो (इमम्) इस [वेद रूप] (मणिम्) मणि [श्रेष्ठ नियम] को (बिभर्ति) रखता है ॥१३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :१३−(न) निषेधे (एनम्) आत्मज्ञानिनम् (घ्नन्ति) मारयन्ति (अप्सरसः) अ० ४।७।२। आकाशे सरणशीला विद्युतः (न) (गन्धर्वाः) अ० २।१।२। पृथिवीधारका मेघाः (न) (मर्त्याः) मनुष्याः (सर्वाः) (दिशः) (वि राजति) विविधं शास्ति। अन्यत् पूर्ववत्-म० १२ ॥