Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 8 / 10 / 7

य॒ज्ञर्तो॑ दक्षि॒णीयो॒ वास॑तेयो भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ 7॥

Veda : Atharvaveda
Warning: Trying to access array offset on value of type null in /home2/vedyog/public_html/vedyog.net/mantra_atharvaveda.php on line 227
| Paryay : | Sukta : 10 | Paryay : 1 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : विराट् | छन्द : आर्च्यनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्म विद्या का उपदेश।

पदपाठ : य॒ज्ञऽऋ॑त: । द॒क्षि॒णीय॑: । वास॑तेय: । भ॒व॒ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥१०.७॥

पदार्थ : वह [पुरुष] (यज्ञर्तः) यज्ञ में पूजा गया, (दक्षिणीयः) दक्षिणायोग्य और (वासतेयः) वसतीयोग्य (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :७−(यज्ञर्तः) यज्ञ ऋ गतौ-क्त। यज्ञे पूजितः (दक्षिणीयः) कडङ्करदक्षिणाच्छ च। पा० ५।१।६९। दक्षिणा-छ। प्रतिष्ठार्हः (वासतेयः) पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ्। पा० ४।४।१०४। वसति−ढञ्। निवासयोग्यः। अन्यत् पूर्ववत् ॥