Atharvaveda / 8 / 10 / 4 / 3
तां द्विमू॑र्धा॒र्त्व्यो᳡धो॒क्तां मा॒यामे॒वाधो॑क्। 3॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 4 | Sukta : 10 | Paryay : 4 | Mantra No : 3
In English:
Seer : atharvaachaaryaH | Devta : viraaT | Metre : saamnyuShNik | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : taa.m dvimuurdhaartvyo᳡dhoktaa.m maayaamevaadhok. 3.
Component Words : taam . dvi.amuurdhaa . artvya᳡H . adhok . taam . maayaam . eva . adhok .13.3.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : विराट् | छन्द : साम्न्युष्णिक् | स्वर :
विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदपाठ : ताम् । द्विऽमू॑र्धा । अ॒र्त्व्य᳡: । अ॒धो॒क् । ताम् । मा॒याम् । ए॒व । अ॒धो॒क् ॥१३.३॥
पदार्थ : (ताम्) उस [विराट्] को (अर्त्व्यः) गति में चतुर (द्विमूर्धा) दो बन्धनवाले [संचित और क्रियमाण कर्मवाले जीव] ने (अधोक्) दुहा है, (ताम्) उस (मायाम्) माया [बुद्धि] को (एव) ही (अधोक्) दुहा है ॥३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३−(ताम्) विराजम् (द्विमूर्धा) श्वन्नुक्षन्पूषन्प्लीहन्क्लेदन्स्नेहन्मूर्धन्०। उ० १।१५९। मुर्वी बन्धने-कनिन्, उकारस्य दीर्घः, वकारस्य धः। संचितक्रियमाणकर्मभ्यां द्विबन्धनो जीवः (अर्त्व्यः) भृमृशीङ्०। उ० १।७। ऋत गतौ जुगुप्सायां कृपायां च-उ प्रत्ययः। तत्र साधुः। पा० ४।४।९८। अर्त्तु-यत्। ऋत्व्यवास्त्व्य०। पा० ६।४।१७५। उकारस्य यण् निपानात्। गतौ साधुः (अधोक्) दुह प्रपूरणे-लङ्। दुग्धवान् (ताम्) (मायाम्) बुद्धिम्। विराजम् (एव) ॥