Atharvaveda / 9 / 3 / 3
आ य॑याम॒ सं ब॑बर्ह ग्र॒न्थींश्च॑कार ते दृ॒ढान्। परूं॑षि वि॒द्वाञ्छस्ते॒वेन्द्रे॑ण॒ वि चृ॑तामसि ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 9 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : bhRRigva~NgiraaH | Devta : shaalaa | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aa yayaama sa.m babarha granthii.mshchakaara te dRRiDhaan. paruu.mShi vidvaa~nChastevendreNa vi chRRitaamasi . 3.
Component Words : aa . yayaama . sam . babarha . granthiin . chakaara . te . dRRiDhaan . paruu.mSha.Ni . vidvaan . shastaa.aiva . indreNa . vi .chRRitaamasi .3.3.
In Hindi:
ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : शाला | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदपाठ : आ । य॒या॒म॒ । सम् । ब॒ब॒र्ह॒ । ग्र॒न्थीन् । च॒का॒र॒ । ते॒ । दृ॒ढान् । परूं॑षि । वि॒द्वान् । शस्ता॑ऽइव । इन्द्रे॑ण । वि ।चृ॒ता॒म॒सि॒ ॥३.३॥
पदार्थ : उस [शिल्पी] ने (ते) तेरी (ग्रन्थीन्) गाँठों को (आ ययाम) फैलाया है, (सम् बबर्ह) मिलाया है और (दृढान्) दृढ़ (चकार) किया है। (परूँषि) जोड़ों को (विद्वान्) विद्वान् (शस्ता इव) चीड़-फाड़ करनेवाले [वैद्य] के समान हम लोग (इन्द्रेण) ऐश्वर्य के साथ (वि) विशेष करके (चृतामसि) बाँधते हैं ॥३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३−(आ ययाम) यमु उपरमे। विस्तारितवान् (सम् बबर्ह) बृह वृद्धौ संवर्द्धितवान्। संयोजितवान् (ग्रन्थीन्) सन्धीन् (चकार) कृतवान् (ते) तव (दृढान्) कठिनान् (परूँषि) अवयवान् (विद्वान्) पण्डितः (शस्ता) शसु हिंसायाम्−तृन्। रुग्णाङ्गानां छेत्ता वैद्यः (इव) यथा (इन्द्रेण) ऐश्वर्येण (वि) विशेषेण (चृतामसि) दृढीकुर्मः ॥