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Atharvaveda / 9 / 3 / 14

अ॒ग्निम॒न्तश्छा॑दयसि॒ पुरु॑षान्प॒शुभिः॑ स॒ह। विजा॑वति॒ प्रजा॑वति॒ वि ते॒ पाशां॑श्चृतामसि ॥ 14॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 9 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : शाला | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

पदपाठ : अ॒ग्निम् । अ॒न्त: । छा॒द॒य॒सि॒ । पुरु॑षान् । प॒शुऽभि॑: । स॒ह । विजा॑ऽवति । प्रजा॑ऽवति । वि । ते॒ । पाशा॑न् । चृ॒ता॒म॒सि॒ ॥३.१४॥

पदार्थ : [हे शाला !] (अग्निम्) अग्नि को और (पुरुषान्) पुरुषों को (पशुभिः सह) पशुओं सहित (अन्तः) अपने भीतर (छादयसि) तू ढक लेती है। (विजावति) हे विविध उत्पन्न पदार्थोंवाली ! और (प्रजावति) हे उत्तम प्रजाओंवाली ! (ते) तेरे (पाशान्) बन्धनों को (वि चृतामसि) हम अच्छे प्रकार ग्रन्थित करते हैं ॥१४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१४−(अग्निम्) यज्ञस्य पाकस्य वा पावकम् (अन्तः) मध्ये (छादयसि) संवृणोषि (पुरुषान्) मनुष्यान् (पशुभिः) गवादिभिः (सह) अन्यत् पूर्ववत् म० १३ ॥