Atharvaveda / 9 / 6 / 1 / 11
यदा॑ञ्जनाभ्यञ्ज॒नमा॒हर॒न्त्याज्य॑मे॒व तत् ॥ 11॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 1 | Sukta : 6 | Paryay : 7 | Mantra No : 11
In English:
Seer : brahmaa | Devta : atithiH, vidyaa | Metre : saamnyanuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yadaa~njanaabhya~njanamaaharantyaajyameva tat . 11.
Component Words : yat . aa~njana.aabhya~njanam . aa.aharanti . aajyam . eva . tat .6.11.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : साम्न्यनुष्टुप् | स्वर :
विषय : संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : यत् । आ॒ञ्ज॒न॒ऽअ॒भ्य॒ञ्ज॒नम् । आ॒ऽहर॑न्ति । आज्य॑म् । ए॒व । तत् ॥६.११॥
पदार्थ : (यत्) जब (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) चन्दन और तेल आदि के मर्दन को (आहरन्ति) वे [गृहस्थ लोग] प्राप्त होते हैं, (तत्) सब [संन्यासी के लिये] (आज्यम्) [संसार का] व्यक्त करनेवाला ब्रह्म (एव) ही है ॥११॥"
भावार्थ : टिप्पणी :११−(यत्) यदा (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-ल्युट्। सम्यक् चन्दनादिलेपनं तैलादिमर्दनं च (आहरन्ति) (आज्यम्) अ० ५।८।१। आङ्+अञ्जू व्यक्तौ-क्यप्। संसारस्य व्यक्तिकरं ब्रह्म (एव) (तत्) तदा ॥