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Atharvaveda / 9 / 6 / 5 / 9

उप॑ हरति॒ प्रति॑ हर॒त्युच्छि॑ष्टं नि॒धन॑म्। 9॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 5 | Sukta : 6 | Paryay : 11 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : साम्न्यनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : उप॑ । ह॒र॒ति॒ । प्रति॑ । ह॒र॒ति॒ । उत्ऽशि॑ष्टम् । नि॒ऽधन॑म् ॥१०.९॥

पदार्थ : [जब] वह [गृहस्थ, भोजन] (उप हरति) भेंट करता है, (उच्छिष्टम्) अतिशिष्ट [उत्तम] (निधनम्) निधि (प्रति हरति) [अतिथि] प्रत्यक्ष प्राप्त कराता है॥९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :८, ९, १०−(अतिथीन्) आदरार्थं बहुवचनम्। अभ्यागतान्। महामान्यान् (प्रति) प्रतीत्य (पश्यति) अवलोकयति (अभि वदति) नमस्करोति (प्र) प्रकर्षेण (स्तौति) आत्मानं प्रशंसति (उदकम्) जलम् (याचति) अ० ९।६(१)।४। ग्रहणार्थं प्रेरयति। विनयेन ददाति (उच्छिष्टम्) उत्+शासु अनुशिष्टौ-क्त। शास इदङ्हलोः। पा० ६।४।३४। इकारः। शासिवसिघसीनां च। पा० ८।३।६०। सस्य षः। अतिशयेन शिष्टं श्रेष्ठम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥