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Atharvaveda / 10 / 3 / 15

यथा॒ वाते॑न॒ प्रक्षी॑णा वृ॒क्षाः शेरे॒ न्य᳡र्पिताः। ए॒वा स॒पत्नां॒स्त्वं मम॒ प्र क्षि॑णीहि॒ न्य᳡र्पय। पूर्वा॑ञ्जा॒ताँ उ॒ताप॑रान्वर॒णस्त्वा॒भि र॑क्षतु ॥ 15॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः | छन्द : षट्पदा जगती | स्वर :

विषय : सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पदपाठ : यथा॑ । वाते॑न । प्रऽक्षी॑णा: । वृ॒क्षा: । शेरे॑ । निऽअ॑र्पिता: । ए॒व । स॒ऽपत्ना॑न् । त्वम् । मम॑ । प्र । क्षि॒णी॒हि॒ । नि । अ॒र्प॒य॒ । पूर्वा॑न् । जा॒तान् । उ॒त । अप॑रान् । व॒र॒ण: । त्वा॒ । अ॒भि । र॒क्ष॒तु॒ ॥३.१५॥

पदार्थ : (यथा) जैसे (वातेन) वायु से (प्रक्षीणाः) नष्ट कर दिये गये और (न्यर्पिताः) झुकाये हुए (वृक्षाः) वृक्ष (शेरे=शेरते) सो जाते हैं, (एव) वैसे ही (मम) मेरे (सपत्नान्) वैरियों को (त्वम्) तू (प्र क्षिणीहि) नाश कर दे और (नि अर्पय) झुका दे, (पूर्वान्) पहिले (जातान्) उत्पन्नों (उत) और (अपरान्) पिछलों को। (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (त्वा) तेरी (अभि) सब ओर से (रक्षतु) रक्षा करे ॥१५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१५−(यथा) (वातेन) वायुना (प्रक्षीणाः) विनाशिताः (वृक्षाः) (शेरे) छान्दसं रूपम्। शेरते। वर्तन्ते (न्यर्पिताः) नीचीकृताः (प्र क्षिणीहि) विनाशय (न्यर्पय) नीचय। अन्यत् पूर्ववत् ॥