Atharvaveda / 10 / 6 / 7
यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॑र्म॒णिं फालं॑ घृत॒श्चुत॑मु॒ग्रं ख॑दि॒रमोज॑से। तमिन्द्रः॒ प्रत्य॑मुञ्च॒तौज॑से वी॒र्या᳡य॒ कम्। सो अ॑स्मै॒ बल॒मिद्दु॑हे॒ भूयो॑भूयः॒ श्वःश्व॒स्तेन॒ त्वं द्वि॑ष॒तो ज॑हि ॥ 7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 6 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : bRRihaspatiH | Devta : phaalamaNiH, vanaspatiH | Metre : tryavasaanaa ShaTpadaa shakvarii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yamabadhnaadbRRihaspatirmaNi.m phaala.m ghRRitashchutamugra.m khadiramojase. tamindraH pratyamu~nchataujase viiryaa᳡ya kam. so asmai balamidduhe bhuuyobhuuyaH shvaHshvastena tva.m dviShato jahi . 7.
Component Words : yam . abadhnaat . bRRihaspatiH . maNim . phaalam . ghRRita.ashchutam . ugram . khadiram . ojase . tam . indraH . prati . amu~nchata . ojase . viiryaa᳡ya . kam . saH . asmai . balam . it . duhe . bhuuyaH.abhuuyaH. shvaH.ashvaH . tena . tvam . dviShataH . jahi .6.7.
In Hindi:
ऋषि : बृहस्पतिः | देवता : फालमणिः, वनस्पतिः | छन्द : त्र्यवसाना षट्पदा शक्वरी | स्वर :
विषय : सब कामनाओं की सिद्धि का उपदेश।
पदपाठ : यम् । अब॑ध्नात् । बृह॒स्पति॑: । म॒णिम् । फाल॑म् । घृ॒त॒ऽश्चुत॑म् । उ॒ग्रम् । ख॒दि॒रम् । ओज॑से । तम् । इन्द्र॑: । प्रति॑ । अ॒मु॒ञ्च॒त॒ । ओज॑से । वी॒र्या᳡य । कम् । स: । अ॒स्मै॒ । बल॑म् । इत् । दु॒हे॒ । भूय॑:ऽभूय:। श्व:ऽश्व॑: । तेन॑ । त्वम् । द्वि॒ष॒त: । ज॒हि॒ ॥६.७॥
पदार्थ : (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी परमेश्वर] ने (यम्) जिस (फालम्) फल के ईश्वर, (घृतश्चुतम्) प्रकाश की बरसा करनेवाले, (उग्रम्) बलवान्, (खदिरम्) स्थिर गुणवाले (मणिम्) मणि [प्रशंसनीय वैदिक नियम] को (ओजसे) बल के लिये (अबध्नात्) बाँधा है [बनाया है]। (तम्) उस [वैदिक नियम] को (इन्द्रः) इन्द्र [मेघसमान उपकारी पुरुष] ने (ओजसे) बल के लिये और (वीर्याय) पराक्रम के लिये (कम्) सुख से (प्रति अमुञ्चत) स्वीकार किया है। (सः) वह [वैदिक नियम] (अस्मै) इस [उपकारी] के लिये (इत्) ही (बलम्) बल को (भूयोभूयः) बहुत-बहुत (श्वः श्वः) कल्प के पीछे कल्प [नित्य आगामी काल में] (दुहे) पूरा करता है, (तेन) उस [वैदिक नियम] से (त्वम्) तू (द्विषतः) वैरियों को (जहि) मार ॥७॥"
भावार्थ : टिप्पणी :७−(इन्द्रः) मेघ इवोपकारी पुरुषः (ओजसे) बलाय (वीर्याय) वीरकर्मणे। पराक्रमाय (कम्) सुखेन (बलम्) सामर्थ्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥