Atharvaveda / 10 / 8 / 6
आ॒विः सन्निहि॑तं॒ गुहा॒ जर॒न्नाम॑ म॒हत्प॒दम्। तत्रे॒दं सर्व॒मार्पि॑त॒मेज॑त्प्रा॒णत्प्रति॑ष्ठितम् ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 8 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : kutsaH | Devta : aatmaa | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aaviH sannihita.m guhaa jarannaama mahatpadam. tatreda.m sarvamaarpitamejatpraaNatpratiShThitam . 6.
Component Words : aaviH . sat . ni.ahitam . guhaa . jarat . naama . mahat . padam . tatra . idam . sarvam.N . aarpitam . ejat . praaNat . prati.asthitam .8.6.
In Hindi:
ऋषि : कुत्सः | देवता : आत्मा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।
पदपाठ : आ॒वि: । सत् । निऽहि॑तम् । गुहा॑ । जर॑त् । नाम॑ । म॒हत् । प॒दम् । तत्र॑ । इ॒दम् । सर्व॑म् । आर्पि॑तम् । एज॑त् । प्रा॒णत् । प्रति॑ऽस्थितम् ॥८.६॥
पदार्थ : (आविः) प्रकट, (जरत्) स्तुतियोग्य, (नाम) प्रसिद्ध (महत्) पूजनीय, (पदम्) पाने योग्य (सत्) अविनाशी ब्रह्म (गुहा) हृदय में (निहितम्) दृढ़ स्थापित है। (तत्र) उसी [ब्रह्म] में (अर्पितम्) जमा हुआ (इदम् सर्वम्) यह सब (एजत्) चेष्टा करता हुआ और (प्राणत्) श्वास लेता हुआ (प्रतिष्ठितम्) प्रत्यक्ष स्थित है ॥६॥"
भावार्थ : टिप्पणी :६−(आविः) अ० ८।३।२४। आङ्+अव रक्षणादिषु-इसि। प्रकटम् (सत्) अविनाशि ब्रह्म (निहितम्) दृढं स्थापितम् (गुहा) गुहायाम्। हृदये (जरत्) जीर्यतेरतृन्। पा० ३।२।१०४। इति जॄ स्तुतौ-अतृन्, बाहुलकात्। जरा स्तुतिर्जरतेः स्तुतिकर्मणः-निरु० १०।८। स्तुत्यम् (नाम) प्रसिद्धम् (महत्) पूजनीयम् (पदम्) प्रापणीयम् (तत्र) ब्रह्मणि (इदम्) दृश्यमानम् (सर्वम्) जगत् (आर्पितम्) समन्तात् स्थापितम् (एजत्) चेष्टायमानम् (प्राणत्) श्वसत् (प्रतिष्ठितम्) प्रत्यक्षं स्थितम् ॥