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Atharvaveda / 10 / 9 / 15

यत्ते॑ क्लो॒मा यद्धृद॑यं पुरी॒तत्स॒हक॑ण्ठिका। आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ 15॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : शतौदना (गौः) | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

पदपाठ : यत् । ते॒ । क्लो॒मा । यत् । हृद॑यम् । पु॒रि॒ऽतत् । स॒हऽक॑ण्ठिका । अ॒मिक्षा॑म् । दु॒ह्र॒ता॒म् । दा॒त्रे । क्षी॒रम् । स॒र्पि:। अथो॒ इति॑ । मधु॑ ॥९.१५॥

पदार्थ : (यत्) जो (ते) तेरा (क्लोमा) फेफड़ा, (यत्) जो (हृदयम्) हृदय और (सहकण्ठिका) कण्ठ के सहित (पुरीतत्) पुरीतत् [शरीर को फैलानेवाली सूक्ष्म आँत] है, वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा [पकाये उष्ण दूध में दही मिलाने से उत्पन्न वस्तु], (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी (अथो) और भी (मधु) मधु ज्ञान [ब्रह्मविद्या] (दात्रे) दाता को (दुह्रताम्) भरपूर करें ॥१५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१५−(क्लोमा) अ० २।३३।३। फुप्फुसम् (पुरीतत्) अ० ९।७।११। पुरिं शरीरं तनोतीति। सूक्ष्मान्तरम् (सहकण्ठिका) कण्ठेन सहिता। अन्यत् स्पष्टं गतं च ॥