Atharvaveda / 10 / 10 / 3
वेदा॒हं स॒प्त प्र॒वतः॑ स॒प्त वे॑द परा॒वतः॑। शिरो॑ य॒ज्ञस्या॒हं वे॑द॒ सोमं॑ चास्यां विचक्ष॒णम् ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : kashyapaH | Devta : vashaa | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : vedaaha.m sapta pravataH sapta veda paraavataH. shiro yaj~nasyaaha.m veda soma.m chaasyaa.m vichakShaNam . 3.
Component Words : veda . aham . sapta . pra.avataH . sapta . veda . paraa.avataH . shiraH . yaj~nasya . aham . veda . somam . cha . asyaam . vi.achakShaNam .10.3.
In Hindi:
ऋषि : कश्यपः | देवता : वशा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदपाठ : वेद॑ । अ॒हम् । स॒प्त । प्र॒ऽवत॑: । स॒प्त । वे॒द॒ । प॒रा॒ऽवत॑: । शिर॑: । य॒ज्ञस्य॑ । अ॒हम् । वे॒द॒ । सोम॑म् । च॒ । अ॒स्या॒म् । वि॒ऽच॒क्ष॒णम् ॥१०.३॥
पदार्थ : (अहम्) मैं (सप्त) सात [२ हाथ, २ पाँव, १ पायु, १ उपस्थ और १ उदर] (प्रवतः) उत्तम गतिवाले [लोकों] को (वेद) जानता हूँ, (सप्त) सात [२ हाथ, २ पाँव, १ पायु, १ उपस्थ और १ उदर] (परावतः) दूर गतिवाले [लोकों] को (वेद) जानता हूँ। (अहम्) मैं (यज्ञस्य) यज्ञ [श्रेष्ठ कर्म] के (शिरः) शिर [प्रधान अपने आत्मा] को (च) और (अस्याम्) इस [कमनीय शक्ति मन्त्र २] में वर्तमान (विचक्षणम्) विविध द्रष्टा [महापण्डित] (सोमम्) सर्वप्रेरक [परमात्मा] को (वेद) जानता हूँ ॥३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३−(वेद) जानामि (अहम्) उपासकः (सोमम्) सोमः सूर्यः प्रसवनात्, सोम आत्माप्येतस्मादेव-निरु० १४।१२। सर्वोत्पादकं सर्वप्रेरकं वा परमात्मानम् (च) (अस्याम्) वशायाम्। कमनीयायां शक्तौ वर्तमानम् (विचक्षणम्) विविधद्रष्टारम्। अन्यत् पूर्ववत्−म० २ ॥