Atharvaveda / 10 / 10 / 29
च॑तु॒र्धा रेतो॑ अभवद्व॒शायाः॑। आप॒स्तुरी॑यम॒मृतं॒ तुरी॑यं य॒ज्ञस्तुरी॑यं प॒शव॒स्तुरी॑यम् ॥ 29॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 29
In English:
Seer : kashyapaH | Devta : vashaa | Metre : tripadaa viraaDgaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : chaturdhaa reto abhavadvashaayaaH. aapasturiiyamamRRita.m turiiya.m yaj~nasturiiya.m pashavasturiiyam . 29.
Component Words : chatuH.adhaa . retaH . abhavat . vashaayaaH . aapaH . turiiyam . amRRitam . turiiyam . yaj~naH . turiiyam . pashavaH . turiiyam .10.29.
In Hindi:
ऋषि : कश्यपः | देवता : वशा | छन्द : त्रिपदा विराड्गायत्री | स्वर :
विषय : ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदपाठ : च॒तु॒:ऽधा । रेत॑: । अ॒भ॒व॒त् । व॒शाया॑: । आप॑: । तुरी॑यम् । अ॒मृत॑म् । तुरी॑यम् । य॒ज्ञ: । तुरी॑यम् । प॒शव॑: । तुरी॑यम् ॥१०.२९॥
पदार्थ : (वशायाः) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] का (रेतः) वीर्य [वा सामर्थ्य] (चतुर्धा) चार प्रकार पर (अभवत्) हुआ है। (आपः) व्यापक तन्मात्राएँ (तुरीयम्) एक चौथाई, (अमृतम्) अमृत [अमरपन] (तुरीयम्) एक चौथाई, (यज्ञः) यज्ञ [संगति किया हुआ संसार] (तुरीयम्) एक चौथाई और (पशवः) दृष्टिवाले [सब प्राणी] (तुरीयम्) एक चौथाई खण्ड हैं ॥२९॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२९−(चतुर्धा) चतुष्प्रकारेण (रेतः) वीर्यम्। सामर्थ्यम् (अभवत्) आसीत् (वशायाः) कमनीयायाः परमेश्वरशक्तेः (आपः) व्यापिकास्तन्मात्राः-दयानन्दभाष्ये, यजुः २७।२५ (तुरीयम्) चतुर्थं खण्डम् (अमृतम्) अमरणम् अविनाशः (यज्ञः) संगतिकरणव्यवहारः संसारः (पशवः) दृष्टिमन्तः प्राणिनः। अन्यद् गतम् ॥