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Atharvaveda / 11 / 2 / 15

नम॑स्तेऽस्त्वाय॒ते नमो॑ अस्तु पराय॒ते। नम॑स्ते रुद्र॒ तिष्ठ॑त॒ आसी॑नायो॒त ते॒ नमः॑ ॥ 15॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : रुद्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदपाठ : नम॑: । ते॒ । अ॒स्तु॒ । आ॒ऽय॒ते । नम॑: । अ॒स्तु॒ । प॒रा॒ऽय॒ते । नम॑: । ते॒ । रु॒द्र॒ । तिष्ठ॑ते । आसी॑नाय । उ॒त । ते॒ । नम॑: ॥२.१५॥

पदार्थ : (आयते) आते हुए [पुरुष] के हित के लिये (ते) तुझे (नमः) नमस्कार, (अस्तु) होवे, (परायते) दूर जाते हुए के हित के लिये (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे। (रुद्र) हे रुद्र ! [दुःखनाशक] (तिष्ठते) खड़े होते हुए के हित के लिये (ते) तुझे (नमः) नमस्कार, (उत) और (आसीनाय) बैठे हुए के हित के लिये (ते) तुझे (नमः) नमस्कार है ॥१५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१५−(नमः) (ते) तुभ्यम् (अस्तु) (आयते) आगच्छतः पुरुषस्य हिताय (परायते) दूरं गच्छते (रुद्र) म० ३। हे दुःखनाशक (तिष्ठते) उत्तिष्ठतः पुरुषस्य हिताय (आसीनाय) उपविष्टस्य हिताय (उत) अपि च। अन्यद् गतम् ॥