Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 11 / 2 / 20

मा नो॑ हिंसी॒रधि॑ नो ब्रूहि॒ परि॑ णो वृङ्ग्धि॒ मा क्रु॑धः। मा त्वया॒ सम॑रामहि ॥ 20॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : रुद्रः | छन्द : भुरिग्गायत्री | स्वर :

विषय : ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदपाठ : मा । न॒: । हिं॒सी॒: । अधि॑ । न॒: । ब्रू॒हि॒ । परि॑ । न॒: । वृ॒ङ्ग्धि॒ । मा । क्रु॒ध॒: । मा । त्वया॑ । सम् । अ॒रा॒म॒हि॒ ॥२.२०॥

पदार्थ : [हे रुद्र परमेश्वर !] (नः) हमें (मा हिंसीः) मत कष्ट दे, (नः) हमें (अधि) ईश्वर होकर (ब्रूहि) उपदेश कर, (नः) हमें [पाप से] (परि वृङ्ग्धि) सर्वथा अलग रख, (मा क्रुधः) क्रोध मत कर। (त्वया) तेरे साथ (मा सम् अरामहि) हम समर [युद्ध] न करें ॥˜२०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२०−(नः) अस्मान् (मा हिंसीः) मा वधीः (अधि) ईश्वरत्वेन (नः) अस्मान् (परि) सर्वतः (वृङ्ग्धि) वर्जय। वियोजय (मा क्रुधः) म० १९। (त्वया) (मा सम् अरामहि) म० ७। समरं युद्धं न करवाम ॥˜