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Atharvaveda / 11 / 3 / 16

बृ॒हदा॒यव॑नं रथन्त॒रं दर्विः॑ ॥ 16॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : बार्हस्पत्यौदनः | छन्द : आसुरी बृहती | स्वर :

विषय : सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान का उपदेश।

पदपाठ : बृ॒हत् । आ॒ऽयव॑नम् । र॒थ॒म्ऽत॒रम् । दर्वि॑: ॥३.१६॥

पदार्थ : (बृहत्) बृहत् [बड़ा आकाश] (आयवनम्) [उस परमेश्वर का] सब ओर से मिलाने का चमचा, और (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय पदार्थों द्वारा पार लगानेवाला जगत्] (दर्विः) [उसकी] डोबी [परोसने की करछी है] ॥१६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१६−(बृहत्) प्रवृद्धमाकाशम् (आयवनम्) आङ्+यु मिश्रणामिश्रणयोः-ल्युट्। समन्ताद् मिश्रणसाधनं चमसः (रथन्तरम्) अ० ८।१०(२)।६। रमु क्रीडायाम्−क्थन्+तॄ प्लवनतरणयोः-खच् मुम् च। रथै रमणीयैः पदार्थैस्तरति येन तज् जगत् (दर्विः) अ० ४।१४।७। दॄ विदारणे-विन्। पाकोद्धारणसाधनम् ॥