Atharvaveda / 11 / 3 / 51
ब्र॒ध्नलो॑को भवति ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपि॑ श्रयते॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ 51॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 51
In English:
Seer : atharvaa | Devta : mantroktaaH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : bradhnaloko bhavati bradhnasya viShTapi shrayate ya eva.m veda . 51.
Component Words : bradhna.alokaH . bhavati . bradhnasya . viShTapi . shrayate . yaH . evam . veda .5.2.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : मन्त्रोक्ताः | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर :
विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदपाठ : ब्र॒ध्नऽलो॑क: । भ॒व॒ति॒ । ब्र॒ध्नस्य॑ । वि॒ष्टपि॑ । श्र॒य॒ते॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥५.२॥
पदार्थ : वह [मनुष्य] (ब्रध्नलोकः) महान् [सबके नियामक परमेश्वर] में निवासवाला (भवति) होता है और [उसी] (ब्रध्नस्य) महान् [सर्वनियामक परमेश्वर] के (विष्टपि) सहारे में (श्रयते) आश्रय लेता है, (यः) जो [मनुष्य] (एवम्) ऐसा (वेद) जानता है ॥५१॥"
भावार्थ : टिप्पणी :५१−(ब्रध्नलोकः) ब्रध्ने सर्वनियामके परमेश्वरे लोको निवासो यस्य सः (भवति) (ब्रध्नस्य) म० ५०। महतः सर्वनियामकस्य परमेश्वरस्य (विष्टपि) म० ५०। आश्रये (श्रयते) तिष्ठति (यः) मनुष्यः (एवम्) उक्तप्रकारेण (वेद) जानाति परमात्मानम् ॥