Atharvaveda / 11 / 8 / 8
कुत॒ इन्द्रः॒ कुतः॒ सोमः॒ कुतो॑ अ॒ग्निर॑जायत। कुत॒स्त्वष्टा॒ सम॑भव॒त्कुतो॑ धा॒ताजा॑यत ॥ 8॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 8 | Paryay : | Mantra No : 8
In English:
Seer : kaurupathiH | Devta : adhyaatmam, manyuH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : kuta indraH kutaH somaH kuto agnirajaayata. kutastvaShTaa samabhavatkuto dhaataajaayata . 8.
Component Words : kutaH . indraH . kutaH . somaH . kutaH . agniH . ajaayata . kutaH . tvaShTaa . sam . abhavat . kutaH . dhaataa . ajaayata .10.8.
In Hindi:
ऋषि : कौरुपथिः | देवता : अध्यात्मम्, मन्युः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदपाठ : कुत॑: । इन्द्र॑: । कुत॑: । सोम॑: । कुत॑: । अ॒ग्नि: । अ॒जा॒य॒त॒ । कुत॑: । त्वष्टा॑ । सम् । अ॒भ॒व॒त् । कुत॑: । धा॒ता । अ॒जा॒य॒त॒ ॥१०.८॥
पदार्थ : (कुतः) कहाँ से [किस कारण से] (इन्द्रः) इन्द्र [मेघ], (कुतः) कहाँ से (सोमः) सोम [प्रेरक वायु], (कुतः) कहाँ से (अग्निः) अग्नि [सूर्य आदि तेज] (अजायत) उत्पन्न हुआ है। (कुतः) कहाँ से (त्वष्टा) त्वष्टा [शरीर आदि का कारण पृथिवी तत्त्व] (सम् अभवत्) उत्पन्न हुआ है, (कुतः) कहाँ से (धाता) धाता [धारण करनेवाला आकाश] (अजायत) प्रकट हुआ है ॥८॥"
भावार्थ : टिप्पणी :८−(कुतः) कस्मात् कारणात् (इन्द्रः) मेघः (सोमः) इत्यस्य मध्यस्थानदेवतासु पाठात्-निरु० ११।२। प्रेरको वायुः (अग्निः) सूर्यादितापः (अजायत) उदपद्यत (त्वष्टा) त्वष्टा तूर्णमश्नुत इति नैरुक्तास्त्विषेर्वा स्याद् दीप्तिकर्मणस्त्वक्षतेर्वा स्यात्करोतिकर्मणः-निरु० ८।१३। इति भूस्थानदेवतासु पाठात्। शरीराणां कारणं पृथिवीतत्त्वम् (धाता) म० ५। लोकानां धारक आकाशः। अन्यद् गतम् ॥