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Atharvaveda / 11 / 8 / 24

आ॑न॒न्दा मोदाः॑ प्र॒मुदो॑ऽभिमोद॒मुद॑श्च॒ ये। ह॒सो न॑रिष्टा नृ॒त्तानि॒ शरी॑र॒मनु॒ प्रावि॑शन् ॥ 24॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 8 | Paryay : | Mantra No : 24

In Hindi:

ऋषि : कौरुपथिः | देवता : अध्यात्मम्, मन्युः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

पदपाठ : आ॒ऽन॒न्दा: । मोदा॑: । प्र॒ऽमुद॑: । अ॒भि॒मो॒द॒ऽमुद॑: । च॒ । ये । ह॒स: । न॒रिष्टा॑ । नृ॒त्तानि॑ । शरी॑रम् । अनु॑ । प्र । अ॒वि॒श॒न् ॥१०.२४॥

पदार्थ : (आनन्दाः) आनन्द, (मोदाः) हर्ष (प्रमुदः) बड़े आनन्द (च) और (ये) (अभिमोदमुदः) बड़े उत्सवों से हर्ष देनेवाले पदार्थ हैं [वे सब और]। (हसः) हंसी, (नृत्तानि) नाचों और (नरिष्टा) मङ्गल कामों [खेल-कूद आदि] [इन सब ने] (शरीरम्) शरीर में (अनु) धीरे-धीरे (प्र अविशन्) प्रवेश किया ॥२४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२४−पूर्वार्धर्चो व्याख्यातः-अ० ११।७।२६। (हसः) स्वनहसोर्वा। पा० ३।३।६२। हसे हसने-अप्। हासः (नरिष्टा) न+रिष हिंसायाम्-कर्तरि-क्त। शेर्लोपः। अरिष्टानि। अहिंसकानि। मङ्गलकर्माणि (नृत्तानि) नृती गात्रविक्षेपे-क्त। तालमानयुक्तान्यङ्गविक्षेपरूपाणि नर्तनानि। अन्यत् पूर्ववत्-म० २२ ॥