Atharvaveda / 11 / 9 / 13
मुह्य॑न्त्वेषां बा॒हव॑श्चित्ताकू॒तं च॒ यद्धृ॒दि। मैषा॒मुच्छे॑षि॒ किं च॒न र॑दि॒ते अ॑र्बुदे॒ तव॑ ॥ 13॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 13
In English:
Seer : kaa~NkaayanaH | Devta : arbudiH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : muhyantveShaa.m baahavashchittaakuuta.m cha yaddhRRidi. maiShaamuchCheShi ki.m chana radite arbude tava . 13.
Component Words : muhyantu . eShaam . baahavaH . chitta.aaakuutam . cha . yat . hRRidi . maa . eShaam . ut . sheShi . kim . chana . radite . arbude . tava .11.13.
In Hindi:
ऋषि : काङ्कायनः | देवता : अर्बुदिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदपाठ : मुह्य॑न्तु । ए॒षा॒म् । बा॒हव॑: । चि॒त्त॒ऽआ॒कू॒तम् । च॒ । यत् । हृ॒दि । मा । ए॒षा॒म् । उत् । शे॒षि॒ । किम् । च॒न । र॒दि॒ते । अ॒र्बु॒दे॒ । तव॑ ॥११.१३॥
पदार्थ : (एषाम्) इन [शत्रुओं] की (बाहवः) भुजाएँ (मुह्यन्तु) निकम्मी हो जावें, (च) और (यत्) जो कुछ (हृदि) हृदय में (चित्ताकूतम्) विचार और सङ्कल्प हैं, (एषाम्) इनका (किं चन) वह कुछ भी, (अर्बुदे) हे अर्बुदि [शूर सेनापति राजन्] (तव) तेरे (रदिते) तोड़ने-फोड़ने पर (मा उत् शेषि) न बचा रहे ॥१३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :१३−(मुह्यन्तु) मूढा निरर्थका भवन्तु (एषाम्) शत्रूणाम् (बाहवः) (चित्ताकूत्तम्) म० १। विचाराणां सङ्कल्पानां च समाहारः (च) (यत्) (हृदि) हृदये (एषाम्) (मा उच्छेषि) शिष्लृ विशेषणे-कर्मणि लुङ्। अवशिष्टं मा भूत् (किंचन) तत् किमपि। अन्यद् गतम्-म० ७ ॥