Atharvaveda / 11 / 10 / 11
येना॒सौ गु॒प्त आ॑दि॒त्य उ॒भाविन्द्र॑श्च॒ तिष्ठ॑तः। त्रिष॑न्धिं दे॒वा अ॑भज॒न्तौज॑से च॒ बला॑य च ॥ 11॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 11
In English:
Seer : bhRRigva~NgiraaH | Devta : triShandhiH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yenaasau gupta aaditya ubhaavindrashcha tiShThataH. triShandhi.m devaa abhajantaujase cha balaaya cha . 11.
Component Words : yena . asau . guptaH . aadityaH . ubhau . indraH . cha . tiShThataH . tri.asa.mdhim . devaaH . abhajanta . ojase . cha . balaaya . cha .12.11.
In Hindi:
ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : त्रिषन्धिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदपाठ : येन॑ । अ॒सौ । गु॒प्त: । आ॒दि॒त्य: । उ॒भौ । इन्द्र॑: । च॒ । तिष्ठ॑त: । त्रिऽसं॑धिम् । दे॒वा: । अ॒भ॒ज॒न्त॒ । ओज॑से । च॒ । बला॑य । च॒ ॥१२.११॥
पदार्थ : (येन) जिस [सेनापति] करके (गुप्तः) रक्षित (असौ) वह (आदित्यः) आदित्य [अखण्ड ब्रह्मचारी] (च) और (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला पुरुष], (उभौ) दोनों (तिष्ठतः) ठहरते हैं। [उस] (त्रिषन्धिम्) त्रिसन्धि [म० २। त्रयीकुशल सेनापति] को (देवाः) विजय चाहनेवालों ने (ओजसे) पराक्रम (च च) और (बलाय) बल के लिये (अभजन्त) भजा है ॥११॥"
भावार्थ : टिप्पणी :११−(येन) त्रिषन्धिना (असौ) प्रसिद्धः (गुप्तः) रक्षितः (आदित्यः) अ० ११।९।२५। अखण्डव्रती (उभौ) (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् पुरुषः (च) (तिष्ठतः) वर्तेते (त्रिषन्धिम्) म० २। त्रयीकुशलं सेनापतिम् (देवाः) विजिगीषवः (अभजन्त) असेवन्त (ओजसे) आत्मिकबलं प्राप्तुम् (च) (बलाय) शारीरिकसामर्थ्यं प्राप्तुम् (च) ॥