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Atharvaveda / 12 / 4 / 19

दु॑रद॒भ्नैन॒मा श॑ये याचि॒तां च॒ न दित्स॑ति। नास्मै॒ कामाः॒ समृ॑ध्यन्ते॒ यामद॑त्त्वा॒ चिकी॑र्षति ॥ 19॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 12 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : वशा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

पदपाठ : दु॒र॒द॒भ्ना । ए॒न॒म् । आ । श॒ये॒ । या॒चि॒ताम् । च॒ । न । दित्स॑ति । न । अ॒स्मै॒ । कामा॑: । सम । ऋ॒ध्य॒न्ते॒ । याम् । अद॑त्वा । चिकी॑र्षति ॥४.१९॥

पदार्थ : (दुरदभ्ना) कभी न दबनेवाली [वह वेदवाणी (एनम्) इस [मनुष्य] पर (आ शये) आ पड़ती है, (च) यदि वह (याचिताम्) माँगी हुई [वेदवाणी] को (न) नहीं (दित्सति) देना चाहता है। (अस्मै) इस [मनुष्य] के लिये (कामाः) वे कामनाएँ (न) नहीं (सम् ऋध्यन्ते) सिद्ध होती हैं, [जिन कामनाओं को] (याम् अदत्त्वा) जिस [वेदवाणी] के न देने पर (चिकीर्षति) पूरा करना चाहता है ॥१९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१९−(दुरदभ्ना) म० ४। कदापि नहि दम्भनीया पराजेयाः (एनम्) मनुष्यम् (आ शये) आशेते। प्राप्नोति (याचिताम्) प्रार्थिताम् (च) यदि (न) निषेधे (दित्सति) दातुमिच्छति (न) (अस्मै) (कामाः) अभिलाषा (समृध्यन्ते) संसिध्यन्ति (याम्) वेदवाणीम् (अदत्त्वा) (चिकीर्षति) कर्तुमिच्छति ॥