Atharvaveda / 12 / 4 / 52
ये गोप॑तिं परा॒णीया॑था॒हुर्मा द॑दा॒ इति॑। रु॒द्रस्या॑स्तां ते हे॒तिं परि॑ य॒न्त्यचि॑त्त्या ॥ 52॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 12 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 52
In English:
Seer : kashyapaH | Devta : vashaa | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ye gopati.m paraaNiiyaathaahurmaa dadaa iti. rudrasyaastaa.m te heti.m pari yantyachittyaa . 52.
Component Words : ye . go.apatim . paraa.aniiya . atha . aahuH . maa . dadaaH . iti . rudrasya . astaam . te . hetim . pari . yanti . achittyaa .4.52.
In Hindi:
ऋषि : कश्यपः | देवता : वशा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदपाठ : ये । गोऽप॑तिम् । प॒रा॒ऽनीय॑ । अथ॑ । आ॒हु: । मा । द॒दा॒: । इति॑ । रु॒द्रस्य॑ । अ॒स्ताम् । ते । हे॒तिम् । परि॑ । य॒न्ति॒ । अचि॑त्त्या ॥४.५२॥
पदार्थ : (अथ) और (ये) जो (गोपतिम्) भूपति [राजा] को (पराणीय) बहका कर (आहुः) कहते हैं−“(मा ददाः इति) मत दे।” (ते) वे लोग (अचित्त्या) अज्ञान से (रुद्रस्य) दुःखनाशक शूर पुरुष के (अस्ताम्) चलाये हुए (हेतिम्) वज्र को (परि) सब ओर से (यन्ति) पाते हैं ॥५२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :५२−(ये) दुष्टाः (गोपतिम्) भूपालम्। राजानम् (पराणीय) कुमार्गे नीत्वा (अथ) पुनः (आहुः) कथयन्ति (मा ददाः) मा देहि (इति) (रुद्रस्य) दुःखनाशकस्य (अस्ताम्) क्षिप्ताम् (ते) दुष्टाः (हेतिम्) वज्रम् (परि) सर्वतः (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (अचित्त्या) अज्ञानेन ॥