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Atharvaveda / 14 / 1 / 23

पू॑र्वाप॒रंच॑रतो मा॒ययैतौ शिशू॒ क्रीड॑न्तौ॒ परि॑ यातोऽर्ण॒वम्। विश्वा॒न्यो भुव॑नावि॒चष्ट॑ ऋ॒तूँर॒न्यो वि॒दध॑ज्जायसे॒ नवः॑ ॥23॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 14 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : सवित्री, सूर्या | देवता : सोमार्क | छन्द : बृहती गर्भा त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : विवाह संस्कार का उपदेश।

पदपाठ : पू॒र्व॒ऽअ॒प॒रम् । च॒र॒त॒: । मा॒यया॑ । ए॒तौ । शिशू॒ इति॑ । क्रीड॑न्तौ । परि॑ । या॒त॒: । अ॒र्ण॒वम् । विश्वा॑ । अ॒न्य: । भुव॑ना । वि॒ऽचष्टे॑ । ऋ॒तून् । अ॒न्य: । वि॒ऽदध॑त् । जा॒य॒से॒ । नव॑: ॥१.२३॥

पदार्थ : (एतौ) यह दोनों [सूर्य, चन्द्रमा] (पूर्वापरम्) आगे-पीछे (मायया) बुद्धि से [ईश्वरनियम से] (चरतः) विचरते हैं, (क्रीडन्तौ) खेलते हुए (शिशू) दो बालक [जैसे] (अर्णवम्)अन्तरिक्ष में (परि) सब ओर (यातः) चलते हैं। (अन्यः) एक [सूर्य] (विश्वा) सब (भुवना) भुवनों को (विचष्टे) देखता है, (अन्यः) दूसरा तू [चन्द्रमा] (ऋतून्)ऋतुओं को [अपनी गति से] (विदधत्) बनाता हुआ [शुक्ल पक्ष में] (नवः) नवीन (जायसे)प्रकट होता है ॥२३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२३−अयं मन्त्रोव्याख्यातः-अ० ७।८१।१ ॥