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Atharvaveda / 15 / 1 / 4

सो᳡ऽव॑र्धत॒ सम॒हान॑भव॒त्स म॑हादे॒वो᳡ऽभ॑वत् ॥4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : एकपदा विराट् गायत्री | स्वर :

विषय : परमात्माऔर जीवात्मा का उपदेश अथवा सृष्टिविद्या का उपदेश।

पदपाठ : स: । अ॒व॒र्ध॒त॒ । स: । म॒हान् । अ॒भ॒व॒त् । स: । म॒हा॒ऽदे॒व: । अ॒भ॒व॒त् ॥१.४॥

पदार्थ : (सः) वह [परमात्मा] (अवर्धत) बढ़ा [उसने अपना सामर्थ्य प्रकट किया], (सः) वह (महान्) महान् [बड़ा, पूजनीय] (अभवत्) हुआ, (सः) वह (महादेवः) महादेव [बड़ा तेजस्वी वा व्यवहारकुशल] (अभवत्) हुआ ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४−(सः) परमात्मा (अवर्धत) प्रवृद्धोऽभवत् (सः) (महान्) पूजनीयः (अभवत्) (सः) (महादेवः) दिवु द्युतौ व्यवहारे च-अच्। महातेजस्वी। महाव्यवहारकुशलः (अभवत्) ॥