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Atharvaveda / 15 / 2 / 15

स उद॑तिष्ठ॒त्सप्र॒तीचीं॒ दिश॒मनु॒ व्य᳡चलत् ॥15॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : साम्नी अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।

पदपाठ : स: । उत् । अ॒ति॒ष्ठ॒त् । स: । प्र॒तीची॑म् । दिश॑म् । अनु॑ । वि । अ॒च॒ल॒त् ॥२.१५॥

पदार्थ : (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (उत् अतिष्ठत्) खड़ा हुआ (सः) वह (प्रतीचीम्) पीछेवाली [वा पश्चिम](दिशम् अनु) दिशा की ओर (वि अचलत्) विचरा ॥१५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१–५−(प्रतीचीम्) पश्चाद्भागस्थाम्। पश्चिमाम्। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥