Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 15 / 5 / 4

तस्मै॒दक्षि॑णाया दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाच्छ॒र्वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन् ॥4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : रुद्र | छन्द : स्वराट् प्राजापत्या पङ्क्ति | स्वर :

विषय : परमात्माके अन्तर्यामी होने का उपदेश।

पदपाठ : तस्मै॑ । दक्षि॑णाया: । दि॒श: । अ॒न्त॒:ऽदे॒शात् । श॒र्वम् । इ॒षु॒ऽआ॒सम् । अ॒नु॒ऽस्था॒तार॑म् । अ॒कु॒र्व॒न् ॥५.४॥

पदार्थ : (तस्मै) उस [विद्वान्] के लिये (दक्षिणायाः दिशः) दक्षिण दिशा के (अन्तर्देशात्) मध्यदेश से (शर्वम्) दुःख विनाशक परमात्मा की (इष्वासम्) हिंसा निवारक, (अनुष्ठातारम्) साथ रहने वाला (अकुर्वन्) उन [विद्वानों] ने बनाया ॥॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४, ५−स्पष्टंपूर्ववच्च ॥