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Atharvaveda / 15 / 11 / 6

यदे॑न॒माह॒व्रात्य॒ यथा॑ ते प्रि॒यं तथा॒स्त्विति॑ प्रि॒यमे॒व तेनाव॑ रुन्द्धे ॥6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 11 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : निचृत् आर्ची बृहती | स्वर :

विषय : अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदपाठ : यत् । ए॒न॒म् । आह॑ । व्रात्य॑ । यथा॑ । ते॒ । प्रि॒यम्‌ । तथा॑ । अ॒स्तु॒ । इति॑ । प्रि॒यम् । ए॒व । तेन॑ । अव॑ । रु॒न्ध्दे॒ ॥११.६॥

पदार्थ : (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [उत्तम व्रतधारी] (यथा) जैसे (ते) तेरा (प्रियम्) प्रिय हो (तथा) वैसा ही (अस्तु इति) होवे−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (प्रियम्) अपने प्रिय वस्तु को (अव रुन्द्धे) वह [गृहस्थ] सुरक्षित करता है ॥६॥"

भावार्थ :