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Atharvaveda / 15 / 13 / 3

तद्यस्यै॒वंवि॒द्वान्व्रात्यो॑ द्वि॒तीयां॒ रात्रि॒मति॑थिर्गृ॒हे वस॑ति ॥3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 13 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : आसुरी गायत्री | स्वर :

विषय : अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।

पदपाठ : तत् । यस्य॑ । ए॒वम् । वि॒द्वान् । व्रात्य॑: । द्वि॒तीया॑म् । रात्रि॑म् । अति॑थि: । गृ॒हे । वस॑ति ॥१३.३॥

पदार्थ : (तत्) सो (एवम्)व्यापक परमात्मा को (विद्वान्) जानता हुआ (व्रात्यः) व्रात्य [सत्यव्रतधारी] (अतिथिः) अतिथि (द्वितीयां रात्रिम्) दूसरी रात्रि (यस्य) जिस [गृहस्थ] के (गृहे) घर में (वसति) वसता है ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३, ४−(अन्तरिक्षे)भूलोकसूर्यमध्यवर्तिनि लोके। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥