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Atharvaveda / 15 / 15 / 4

तस्य॒व्रात्य॑स्य। यो᳡ऽस्य॑ द्वि॒तीयः॑ प्रा॒णः प्रौढो॒ नामा॒सौ स आ॑दि॒त्यः ॥4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । द्वि॒तीय॑: । प्रा॒ण: । प्र॒ऽऊ॒ढ: । नाम॑ । अ॒सौ । स: । आ॒दि॒त्य: ॥१५.४॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (द्वितीयः) दूसरा (प्राणः) प्राण (प्रौढः) प्रौढ (ऊर्ध्वः) [प्रवृद्ध] (नाम) नामहै, (सः) सो (असौ) यह (आदित्यः) चमकनेवाला सूर्य है [अर्थात् वह सूर्यविद्या काप्रकाशक होता है−कि सूर्य का पृथिवी आदि लोकों और उनके पदार्थों से और उन सबकासूर्यलोक से क्या सम्बन्ध है, यह विचारता है] ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४−(प्रौढः) प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु। वा० पा० ६।१।८९। प्र+ऊढः, वृद्धिः।प्रवृद्धः (आदित्यः) आदीप्यमानसूर्यविद्याप्रकाशः। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥