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Atharvaveda / 15 / 16 / 5

तस्य॒व्रात्य॑स्य।यो᳡ऽस्य॑ पञ्च॒मो᳡ऽपा॒नः सा दी॒क्षा ॥5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 16 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : प्राजापत्या उष्णिक् | स्वर :

विषय : अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । प॒ञ्च॒म: । अ॒पा॒न: । सा । दी॒क्षा ॥१६.५॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (पञ्चमः) पाचवाँ (अपानः) अपान [प्रश्वास] है, (सा दीक्षा) वह दीक्षा है [वह नियमऔर व्रतपालन की शिक्षा करता है] ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५−(दीक्षा) नियमव्रतयोःशिक्षा। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥