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Atharvaveda / 15 / 17 / 6

तस्य॒व्रात्य॑स्य।यो᳡ऽस्य॑ ष॒ष्ठो व्या॒नस्त आ॑र्त॒वाः ॥6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : याजुषी त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । ष॒ष्ठ: । वि॒ऽआ॒न: । ते । आ॒र्त॒वा: ॥१७.६॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (षष्ठः) छठा (व्यानः) व्यान [सब शरीर में फैला हुआ वायु] है, (ते) वे (आर्तवाः)ऋतुओं में उत्पन्न पदार्थ हैं [अर्थात् वह फूल आदि की उत्पत्ति और उपकार काज्ञान देता है] ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :६−(आर्तवाः) ऋतुभवानांपुष्पफलादिपदार्थानां ज्ञानम्। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥