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Atharvaveda / 16 / 5 / 10

तं त्वा॑ स्वप्न॒तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्न दुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥10॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 16 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : यम | देवता : दुःस्वप्ननाशन | छन्द : द्विपदा साम्नी बृहती | स्वर :

विषय : आलस्यादिदोष के त्याग के लिये उपदेश।

पदपाठ : तम् । त्वा॒ । स्व॒प्न॒ । तथा॑ । सम् । वि॒द्म॒ । स: । न॒: । स्व॒प्न॒ । दु॒:ऽस्वप्न्या॑त् । पा॒हि॒ ॥५.१०॥

पदार्थ : (स्वप्न) हे स्वप्न [आलस्य] (तम्) उस (त्वा) तुझको (तथा) वैसा ही (सम्) अच्छे प्रकार (विद्म) हमजानते हैं, (सः) सो तू (स्वप्न) हे स्वप्न ! (नः) हमें (दुःष्वप्न्यात्) बुरीनिद्रा में उठे कुविचार से (पाहि) बचा ॥१०॥"

भावार्थ :