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Atharvaveda / 17 / 1 / 26

सू॑र्यनावमारुक्षः श॒तारि॑त्रां स्व॒स्तये॑। रात्रिं॒ मात्य॑पीप॒रोऽहः॑ स॒त्राति॑पारय ॥26॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 17 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 26

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : आदित्य | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : आयु की बढ़ती के लिये उपदेश।

पदपाठ : सूर्य॑ । नाव॑म् । आ । अ॒रु॒क्ष॒: । श॒त॒ऽअरि॑त्राम् । स्व॒स्तये॑ । रात्रि॑म् । मा॒ । अति॑ । अ॒पी॒प॒र॒: । अह॑: । स॒त्रा । अति॑ । पा॒र॒य॒ ॥१.२६॥

पदार्थ : (सूर्य) हे सूर्य ! [सबके चलानेवाले जगदीश्वर] (स्वस्तये) [हमारे] आनन्द के लिये (शतारित्राम्)सैकड़ों डाड़ोंवाली (नावम्) नाव पर (आ अरुक्षः) तू चढ़ा है। (मा) मुझ से (रात्रिम्) रात्रि को (अति अपीपरः) तूने सर्वथा पार कराया है, (अहः) दिन (सत्रा)भी (अति पारय) सर्वथा तू पार करा ॥२६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२६−(सूर्य) हे सर्वप्रेरक जगदीश्वर (रात्रिम्) रात्रिकर्त्तव्यम् (अहः) दिनकर्त्तव्यम्। अन्यत् पूर्ववत्-म० २५॥