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Atharvaveda / 18 / 2 / 42

निरि॒मांमात्रां॑ मिमीमहे॒ यथाप॑रं॒ न मासा॑तै। श॒ते श॒रत्सु॑ नो पु॒रा ॥42॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 42

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : यम, मन्त्रोक्त | छन्द : भुरिक् आर्षी गायत्री | स्वर :

विषय : मोक्ष के लिये प्रयत्न का उपदेश।

पदपाठ : नि: । इ॒माम् । मात्रा॑म् । मि॒मी॒म॒हे॒ । यथा॑ । अप॑रम् । न । मासा॑तै । श॒ते । श॒रत्ऽसु॑ । नो इति॑ । पु॒रा ॥ २.४२॥

पदार्थ : (इमाम्) इस [वेदोक्त] (मात्राम्) मात्रा [मर्यादा] को (निः) निश्चय करके (मिमीमहे) हम नापते हैं, (यथा) क्योंकि (अपरम्)अन्य प्रकार से [उस मर्यादा को, कोई भी] (न) नहीं (मासातै) नाप सकता। (शतेशरत्सु) सौ वर्षों में भी (पुरा) लगातार (नो) कभी नहीं ॥४२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४२−(निः) निश्चयेन। अन्यत् पूर्ववत्−३८ ॥