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Atharvaveda / 18 / 4 / 17

अ॑पू॒पवा॒न्दधि॑वांश्च॒रुरेह सी॑दतु। लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ येदे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥17॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : यम, मन्त्रोक्त | छन्द : त्रिपदा भुरिक् महाबृहती | स्वर :

विषय : यजमान के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : अ॒पू॒पऽवा॑न् । दधि॑ऽवान् । च॒रु: । आ । इ॒ह । सी॒द॒तु॒ । लो॒क॒ऽकृत॑: । प॒थि॒ऽकृत॑: । य॒जा॒म॒हे॒। ये । दे॒वाना॑म् । हु॒तऽभा॑गा: । इ॒ह । स्थ ॥४.१७॥

पदार्थ : (अपूपवान्) अपूपों [शुद्ध पके हुए भोजनों मालपूए पूड़ी आदि]वाला, (दधिवान्) पुष्टिकारकपदार्थोंवाला (चरुः) चरु [स्थालीपाक] (इह) यहाँ [वेदी पर] (आ सीदतु) आवे। (लोककृतः) समाजों केकरनेवाले, (पथिकृतः) मार्गों के बनानेवाले [तुम लोगों] को (यजामहे) हम पूजतेहैं, (ये) जो तुम (देवानाम्) विद्वानों के बीच (हुतभागाः) भाग लेनेवाले (इह)यहाँ पर (स्थ) हो ॥१७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१७−(दधिवान्) आदॄगमहनजनः किकिनौ लिट् च। पा० ३।२।१७१। डुधाञ्धारणपोषणयोः-किन् प्रत्ययः। पोषकपदार्थयुक्तः। अन्यत् पूर्ववत्-म० १६ ॥